पितृ पक्ष: श्राद्ध पूर्वज़ों के प्रति श्रद्धा रखने से जीवन में आता है चमत्कारी बदलाव

 

मान्यता भी है कि यदि विधिनुसार पितरों का तर्पण न किया जाये तो उन्हें मुक्ति नहीं मिलती और उनकी आत्मा मृत्युलोक में भटकती रहती है।

 

 

 

 

 

 

पितृ पक्ष में तिथि अनुसार विधि विधान करें, पितृ पक्ष काल 13 सितंबर से 28 सितंबर

प्रारंभ: 13 सितंबर- पूर्णिमा का श्राद्ध
14 सितंबर- सुबह 10.03 बजे तक पूर्णिमा तिथि रहेगी। पश्चात प्रतिपदा लगेगी।
15 सितंबर- दोपहर 12.23 बजे तक प्रतिपदा तिथि रहेगी। पश्चात द्वितीया लगेगी।
16 सितंबर- दोपहर 2.35 बजे तक द्वितीया तिथि रहेगी। पश्चात तृतीया लगेगी।
17 सितंबर- तृतीया का श्राद्ध
18 सितंबर- चतुर्थी का श्राद्ध
19 सितंबर- पंचमी का श्राद्ध
20 सितंबर- षष्ठी का श्राद्ध
21 सितंबर- सप्तमी का श्राद्ध
22 सितंबर- अष्टमी का श्राद्ध
23 सितंबर- नवमी का श्राद्ध
24 सितंबर- दशमी का श्राद्ध
25 सितंबर- एकादशी का श्राद्ध
26 सितंबर- द्वादशी प्रातः 11.02 बजे तक, उपरांत त्रयोदशी
27 सितंबर- त्रयोदशी प्रातः 7.31 बजे तक, उपरांत चतुर्दशी, इस दिन त्रयोदशी-चतुर्दशी का श्राद्ध होगा।
समाप्ति 28 सितंबर- सर्वपितृ अमावस्या

हिंदू धर्म में वैदिक परंपरा के अनुसार अनेक रीति-रिवाज़, व्रत-त्यौहार व परंपराएं मौजूद हैं। गणेशोत्सव के बाद शुरू होता है पितृपक्ष यानी श्राद्ध पक्ष। इन दिनों में पूर्वजों का श्राद्ध किया जाता है। हिंदूओं में जातक के गर्भधारण से लेकर मृत्योपरांत तक अनेक प्रकार के संस्कार किये जाते हैं। अंत्येष्टि को अंतिम संस्कार माना जाता है। लेकिन अंत्येष्टि के पश्चात भी कुछ ऐसे कर्म होते हैं जिन्हें मृतक के संबंधी विशेषकर संतान को करना होता है। श्राद्ध कर्म उन्हीं में से एक है। वैसे तो प्रत्येक मास की अमावस्या तिथि को श्राद्ध कर्म किया जा सकता है लेकिन भाद्रपद मास की पूर्णिमा से लेकर आश्विन मास की अमावस्या तक पूरा पखवाड़ा श्राद्ध कर्म करने का विधान है। इसलिये अपने पूर्वज़ों के प्रति श्रद्धा प्रकट करने के इस पर्व को श्राद्ध कहते हैं।

पितृ पक्ष का महत्व

पौराणिक ग्रंथों में वर्णित किया गया है कि देवपूजा से पहले जातक को अपने पूर्वजों की पूजा करनी चाहिये। पितरों के प्रसन्न होने पर देवता भी प्रसन्न होते हैं। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में जीवित रहते हुए घर के बड़े बुजूर्गों का सम्मान और मृत्योपरांत श्राद्ध कर्म किये जाते हैं। इसके पिछे यह मान्यता भी है कि यदि विधिनुसार पितरों का तर्पण न किया जाये तो उन्हें मुक्ति नहीं मिलती और उनकी आत्मा मृत्युलोक में भटकती रहती है। पितृ पक्ष को मनाने का ज्योतिषीय कारण भी है। ज्योतिषशास्त्र में पितृ दोष काफी अहम माना जाता है। जब जातक सफलता के बिल्कुल नज़दीक पंहुचकर भी सफलता से वंचित होता हो, संतान उत्पत्ति में परेशानियां आ रही हों, धन हानि हो रही हों तो ज्योतिषाचार्य पितृदोष से पीड़ित होने की प्रबल संभावनाएं बताते हैं। इसलिये पितृदोष से मुक्ति के लिये भी पितरों की शांति आवश्यक मानी जाती है।

 

किस दिन करें पूर्वज़ों का श्राद्ध

वैसे तो प्रत्येक मास की अमावस्या को पितरों की शांति के लिये पिंड दान या श्राद्ध कर्म किये जा सकते हैं लेकिन पितृ पक्ष में श्राद्ध करने का महत्व अधिक माना जाता है। पितृ पक्ष में किस दिन पूर्वज़ों का श्राद्ध करें इसके लिये शास्त्र सम्मत विचार यह है कि जिस पूर्वज़, पितर या परिवार के मृत सदस्य के परलोक गमन की तिथि याद हो तो पितृपक्ष में पड़ने वाली उक्त तिथि को ही उनका श्राद्ध करना चाहिये। यदि देहावसान की तिथि ज्ञात न हो तो आश्विन अमावस्या को श्राद्ध किया जा सकता है इसे सर्वपितृ अमावस्या भी इसलिये कहा जाता है। समय से पहले यानि जिन परिजनों की किसी दुर्घटना अथवा सुसाइड आदि से अकाल मृत्यु हुई हो तो उनका श्राद्ध चतुर्दशी तिथि को किया जाता है। पिता के लिये अष्टमी तो माता के लिये नवमी की तिथि श्राद्ध करने के लिये उपयुक्त मानी जाती है।

आइये जानते हैं उन कामों के बारे में जो श्राद्ध पक्ष में नहीं किये जाने चाहिए।

* ऐसी मान्यता है की पितृपक्ष के दिनों में ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए यानी स्त्री पुरुष संसर्ग से बचना चाहिए। इसके पीछे यह धारणा है की पितृ आपके घर में होते हैं और यह उनके प्रति श्रद्धा प्रकट करने का समय होता है इसलिए इन दिनों संयम का पालन करना चाहिए। * पितृपक्ष में स्वर्ण और नए वस्त्रों की खरीदारी नहीं करनी चाहिए। ऐसा इसलिए माना जाता है क्योंकि पितृपक्ष उत्सव का नहीं बल्कि एक तरह से शोक व्यक्त करने का समय होता है उनके प्रति जो अब हमारे बीच नहीं रहे।

* इन दिनों दाढ़ी मूंछें भी नहीं काटे जाते हैं। इसका संबंध भी शोक व्यक्त करने से है।

* पितृपक्ष में द्वार पर आए अतिथि और याचक को बिना भोजन पानी दिए जाने नहीं देना चाहिए। माना जाता है कि पितर किसी भी रुप में श्राद्ध मांगने आ सकते हैं। इसलिए किसी का अनादर नहीं करना चाहिए।
 
* माना जाता है कि पितृपक्ष में नया घर नहीं लेना चाहिए। असल में घर लेने में कोई बुराई नहीं है असल कारण है स्थान परिवर्तन। माना जाता है कि जहां पितरों की मृत्यु हुई होती है वह अपने उसी स्थान पर लौटते हैं। अगर उनके परिजन उस स्थान पर नहीं मिलते हैं तो उन्हें तकलीफ होती है। अगर आप पितरों के लिए श्राद्ध तर्पण कर रहे हैं तो उन्हें आपके घर खरीदने से कोई परेशानी नहीं होती है।

* पितृपक्ष को लेकर ऐसी मान्यता है कि इन दिनों नए वाहन नहीं खरीदने चाहिए। असल में वाहन खरीदने में कोई बुराई नहीं है। शास्त्रों में इस बात की कहीं मनाही नहीं है। बात बस इतनी है कि इसे भौतिक सुख से जोड़कर जाना जाता है। जब आप शोक में होते हैं तो या किसी के प्रति दुख प्रकट करते है तो जश्न नहीं मनाते हैं। इसलिए धारणा है कि इन दिनों वाहन नहीं खरीदना चाहिए

* पितृपक्ष में बिना पितरों को भोजन दिया स्वयं भोजन नहीं करना चाहिए इसका मतलब यह है कि जो भी भोजन बने उसमें एक हिस्सा गाय, कुत्ता, बिल्ली, कौआ को खिला देना चाहिए।

श्राद्ध में पढ़ें यह पवित्र प्रयोज्य मंत्र  

हमारे धार्मिक कार्यों की पूर्णता बगैर मंत्र तथा स्तोत्र के नहीं होती है। श्राद्ध में भी इनका विशेष महत्व है। स्तोत्र कई हैं। दो का उल्लेख पर्याप्त होगा। पहला है पुरुष सूक्त तथा दूसरा है पितृ सूक्त।
 इनके उपलब्ध न होने पर निम्न मंत्रों के प्रयोग से कार्य की पूर्णता हो सकती है।
 
1. ॐ कुलदेवतायै नम: (21 बार) ।
 
2. ॐ कुलदैव्यै नम: (21 बार) ।
 
3. ॐ नागदेवतायै नम: (21 बार) ।

 
4. ॐ पितृ दैवतायै नम: (108 बार) ।
 
इनका प्रयोग कर पितरों को प्रसन्न कर समस्याओं से निजात पाई जा सकती है। ब्राह्मण भोजन के लिए ब्राह्मण को बैठाकर पैर धोएं तथा भोजन कराएं। संकल्प पहले लें तथा ब्राह्मण को भोजन करवाकर दक्षिणा दें, वस्त्रादि दें। यदि शक्ति सामर्थ्य हो तो गौ-भूमि दान दें। न हो तो भूमि गौ के लिए द्रव्य दें। इनका भी संकल्प होता है।

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