90 के दशक में अजय मेहरा (घायल), करन भाई(जीत)
मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरी (बॉर्डर), काशी (घातक), जिद्दी (देवा) और तारासिंह (गदर) को देखने जो भीड़ सिनेमाघरों में उमड़ती थी। उसे नियंत्रित करने के लिए पुलिस बल लगाना पड़ता था। दामिनी में उनका डायलॉग- “ये ढाई किलो का हाथ” आज तक लोगों की जुबां पर है। हिंदी सिनेमा देखने के उस स्वर्णिम दौर को फिर से लाने की क्षमता सन्नी पाजी में ही है। उम्मीद करते हैं कि 11 अगस्त को देशभर के सिंगल स्क्रीन टॉकीज फिर से गुलजार होंगे। सन्नी पाजी जब दहाड़ेंगे- “हिंदुस्तान जिंदाबाद” तो फिर से तालियां और सीटियां बजेंगी। सोशल मीडिया में अभी मची है ग़दर- 2 के पोस्टरों की, पूरे हिंदुस्तान को शिद्दत से इंतजार है।
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