भगवान विष्णु करवट बदलते है ग्यारस भाद्रपद मास

 

हिंदू धार्मिक ग्रंथों में डोल ग्यारस भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाया जाता हैं। इस दिन भगवान विष्णु करवट बदलते हैं। यह दिन वामन एकादशी के नाम से भी प्रसिद्ध है। इस दिन से चार्तमास व्रत का भी पालन करने वाले वैष्णव भक्तों के तीसरे मास का व्रत शुरु होता है। इस दिन भगवान विष्णु के शयन काल के दो माह पूरे हो जाते हैं, आज वे करवट बदलते हैं। आज एकादशी पर भगवान विष्णु के साथ उनकी अर्धांगिनी माता लक्ष्मी की आराधना से धन व सुख की प्राप्ति होती हैं। शास्त्रों के अनुसार इस दिन देवी-देवता भी व्रत रखते हैं। इस बार 9 सितंबर को डोल ग्यारस पर्व और वामन जयंती बड़े धूम धाम से मनाया जा रहा हैं।


डोल ग्यारस की कथा

भगवान कृष्ण के बाल स्वरूप का जलवा पूजन किया जाता हैं यानी सूरज पूजा। माता यशोदा ने भगवान कृष्ण को सूरज देवता के इसी दिन दर्शन कराए थे। फिर नए कपड़े पहनाए और शुद्ध कर धार्मिक कार्यों में शामिल किया था। इस दिन कान्हा की पालना रस्म भी संपन्न हुई थी। अत: इस एकादशी को जलझूलनी एकादशी भी कहा जाता है। ये दिन को डोल ग्यारस के नाम से पुरे देश में मनाया जाता है इस दिन गोकुल में विशेष पूजन किया जाता है देश विदेश में जगह-जगह झांकियां निकाली जाती हैं। माता यशोदा की गोद भरी जाती हैं। डोल सजाकर श्रीकृष्ण की झांकियां निकालते हैं। इस दिन भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजन भी की जाती हैं।

परिवर्तनी और वामन जयंति की कथा

एक बार भगवान कृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा था कि भगवना विष्णु अपनी शैया पर सोते हुए करवट बदलते हैं, उस दिन परिवर्तनी ग्यारस मनाई जाती हैं। इसी दिन दानव बलि, दैत्य राजा से भगवान विष्णु ने वामन अवतार में उसका सर्वस्व दान में ले लिया था। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर एक प्रतिमा राजा बलि को सौंप दिया था। इस प्रकार इस दिन को वामन जयंती के रुप में भी मनाते हैं।

भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की ग्यारस को हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार झलझूलनी एकादशी कहा जाता हैं। इसे परिवर्तिनी एकादशी व डोल ग्यारस आदि नामों से भी जाना जाता है। इस दिन भगवान वामन की पूजा की जाती है। कुछ स्थानों पर ये दिन भगवान श्रीकृष्ण की सूरज पूजा जन्म के बाद होने वाला मांगिलक कार्यक्रम के रूप में मनाया जाता है। इस व्रत को करने से जातक को वाजपेय यज्ञ के समान फल प्राप्त होता है। जब कोई व्यक्ति अपने प्रतिस्पर्धियों में सबसे आगे निकलना चाहता है। सम्राट के समान उपाधि प्राप्त करना चाहता है तो इस मनोकामना पूर्ति के लिए वाजपेय यज्ञ किया जाता है।

व्रत कैसे करें, क्या है वाजपेय यज्ञ

व्रत का पालनडोल ग्यारस व्रत का नियम पालन दशमी तिथि की रात से ही शुरू करें व ब्रह्मचर्य का पालन करें। एकादशी के दिन सुबह स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनकर भगवान वामन की प्रतिमा के सामने बैठकर व्रत का संकल्प लें। इस दिन यथासंभव उपवास करें उपवास में अन्न ग्रहण नहीं करें संभव न हो तो एक समय फलाहारी कर सकते हैं।
इसके बाद भगवान वामन की पूजा विधि-विधान से करें यदि आप पूजन करने में असमर्थ हों तो पूजन किसी योग्य ब्राह्मण से भी करवा सकते हैं। भगवान वामन को पंचामृत से स्नान कराएं। स्नान के बाद उनके चरणामृत को व्रती (व्रत करने वाला) अपने और परिवार के सभी सदस्यों के अंगों पर छिड़कें और उस चरणामृत को पीएं। इसके बाद भगवान को गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि पूजन सामग्री अर्पित करें। विष्णु सहस्त्रनाम का जाप एवं भगवान वामन की कथा सुनें।
वाजपेय यज्ञ का विशिष्ट धार्मिक एवं वैदिक महत्व है। यह सोमा यज्ञों का सबसे महत्वपूर्ण है। यज्ञ आमतौर पर उच्च स्तर और बड़े पैमाने पर किया जाता है। भारतीय इतिहास के अध्ययन से पता चलता है कि सवाई जय सिंह ने कम से कम दो यज्ञ प्रदर्शन किये जो कि वैदिक साहित्य में ‘वाजपेय’ तथा ‘अश्वमेध’ नामों से वर्णित हैं। ईश्वरविलाश महाकाव्य के अनुसार जय सिंह प्रथम वाजपेय यज्ञ किया और सम्राट सम्राट उपाधि धारण की। आधुनिक भारत में वाजपेय यज्ञ करने वाले लोगों ने अभिनय शिक्षा, साहित्य, कूटनीति, राजनीति में महत्वपूर्ण सम्मान अर्जित किया है।

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