छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति को लेकर अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि सिर्फ शादीशुदा होने के आधार पर किसी बेटी को अनुकंपा नियुक्ति से वंचित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण बैंक को दो विवाहित बेटियों को उनकी शैक्षणिक योग्यता और लागू नियमों के अनुसार अनुकंपा नियुक्ति देने का निर्देश दिया है।
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति में वैवाहिक स्थिति नहीं, बल्कि वास्तविक आर्थिक निर्भरता महत्वपूर्ण है। अदालत ने यह भी कहा कि यदि किसी योजना के तहत विवाहित बेटे को केवल शादी के आधार पर अयोग्य नहीं माना जाता, तो उसी आधार पर विवाहित बेटी को भी लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता।
बेटियों के आवेदन शादी के आधार पर हुए थे खारिज
मामला छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण बैंक के दो दिवंगत कर्मचारियों से जुड़ा है। उनके निधन के बाद उनकी विवाहित बेटियों ने अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया था, लेकिन बैंक ने उनकी वैवाहिक स्थिति का हवाला देते हुए दावों को खारिज कर दिया। इसके बाद दोनों महिलाओं ने हाईकोर्ट का रुख किया।
खंडपीठ ने माना कि केवल विवाह को आधार बनाकर बेटियों को अनुकंपा नियुक्ति से बाहर करना मनमाना और भेदभावपूर्ण है। अदालत ने पहले दिए गए एकल पीठ के आदेश को भी निरस्त कर दिया।
90 दिनों के भीतर नियुक्ति के आदेश
हाईकोर्ट ने संबंधित बैंक को निर्देश दिया है कि आदेश प्राप्त होने के 90 दिनों के भीतर दोनों महिलाओं को उनकी शैक्षणिक योग्यता और लागू नियमों के अनुसार उपयुक्त पदों पर नियुक्ति दी जाए।
कोर्ट के इस फैसले को महिलाओं के समान अधिकार और अनुकंपा नियुक्ति की प्रक्रिया में लैंगिक भेदभाव खत्म करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। फैसला यह स्पष्ट करता है कि किसी महिला की शादी अपने आप में यह साबित नहीं करती कि वह अपने माता-पिता के परिवार पर आर्थिक रूप से निर्भर नहीं है।
























