क्‍यों कहते हैं “गणपति बप्‍पा मोरया”

ज्योतिषाचार्य के मतानुसार  चतुर्थी की सुबह सूर्योदय से 7.44 तक है। दिन में 11.42 से 2 बजे तक और शाम को 5.07 से 7.27 बजे तक गणेश स्थापना की जा सकती है।

भारतीय लगभग पूरे देश में पूरे धूमधाम से मनाते हैं , गणेश हमारी संस्कृति के मंगलमूर्ति देव हैं । वैसे तो हमारे समस्त देवी-देवताओं में दातापन है, किन्तु गणेश मंगलदाता हैं। वे सारे काज निर्विघ्न पूर्ण करते हैं। हमारे लोकगीतों में उनकी प्रशस्ति के गीत हैं। मालवी लोकगीतों में तो गणेश की पारस की मूर्ति बनाने की कल्पना है, जिसे छू कर हमारा विकारी जीवन स्वर्ण बन जाए। दरअसल, गणेश हमारे सोच, चिंतन, धारणा और व्यवहार में इसलिए पूजनीय हैं क्योंकि वे गुणों की खान हैं। उनमें समस्त गुण और शक्तियां शोभायमान हैं। श्री गणेश अर्थात्‌ श्री गुणेश। वे श्री अर्थात्‌ श्रेष्ठ तो हैं ही, देवताओं में गुणों के देव हैं।

 

आज जगह-जगह अमंगल का साम्राज्य है। दुर्गुणों का बोल-बाला है। हिंसा, क्रोध और विकारों से भरपूर है पूरा जीवन। विवेक लुप्त है। सहानुभूतियां गुम हैं। धर्म के नाम पर आडम्बर शीर्ष पर है। मनुष्य मात्र जैसे अपने लक्ष्य अर्थात्‌ अन्तरदर्शन को भूल गया है। ज्ञान और विवेक ही जब विलुप्त है तो फिर आदमी से दैवोचित व्यवहार की उम्मीद कैसे की जाए? गणेश हमें दैवोचित गुणों को धारण करने की प्रेरणा देते हैं।

सच पूछो तो हमारे देवताओं की पवित्र नज़रों में निहाल करने की शक्तियां हैं। इसीलिए तो आज भी उनकी जड़-मूर्तियों के सम्मुख लाखों, हज़ारों लोग सिर टेकते हैं, मन्नतें मांगते हैं और कल्याण की कामना करते हैं। गणेश विघ्न-विनाशक मंगलमूर्ति देव ऐसे देव हैं जिनका दर्शन मात्र हमारे समस्त विकारों का नाश करता है।

गणेश हमारे बोल, संकल्प, दृष्टि, चलन, व्यवहार को पवित्र बनाने वाले परम प्रेरक देव हैं। गणेश की आकृति ही स्पष्ट रूप से सिद्ध करती है कि उनका स्वरूप सचमुच दैवी गुणों की आकृति है। गणेश की आंखें छोटी हैं जो हमें सिखाती है कि हमारी दृष्टि सूक्ष्म हो। गणेश के सूप जैसे कान बताते हैं कि हम दुनिया की बातें सुनें, सबकी सुनें, किन्तु अचल-अडौल बने रहें। गणेश का छोटा मुंह इस बात का प्रतीक है कि हम कम बोलें, कम आकांक्षाएं रखें।

गणेश का बड़ा सिर विवेक का प्रतीक है। गणेश का बड़ा पेट सूचक है सहनशीलता का, समाने का। विशाल उदर, उदारता का प्रतीक है । गणेश की सूँड अद्‌भुत परख-शक्ति की प्रतीक है। गणेश का वाहन चूहा है। चूहा हमारे साधनों को कुतरता है, काटता है, अर्थात्‌ समर्थ को व्यर्थ बनाता है। हमें ऐसे तमाम साधनों को अपने वश में करके रखना चाहिए जो व्यर्थ को बढ़ावा देते हैं, उन्हें दबाकर रखना चाहिए, चाहे ये साधन कितने ही छोटे क्यों न हों। कहने का तात्पर्य है कि जब हम गणेश जैसे विकार रहित हो जाएंगे तो स्वयं मंगल-मूरत बन जाएंगे। गणेश की प्रशस्ति और पूजा इसी में है कि हम गणेश के स्वरूप को अपने गुणों में धारण करें।

कब से मनाते हैं गणेश उत्‍सव ?

गणेश उत्‍सव कब से मनाया जाने लगा, इसकी कोई निश्चित तिथि ज्ञात नहीं है, लेकिन 1893 के पहले भी गणपति उत्सव केवल घरों तक ही सीमित था और उस समय आज की तरह भगवान गणपति की बडी-बडी मूर्तियां या बडे-बडे पंडाल नहीं बनाए जाते थे, ना ही सामूहिक गणपति विराजते थे। लेकिन श्री बाल गंगाधर तिलक ने 1893 में अंग्रेजों के खिलाफ भारतीयों को एकजुट करने के लिए इसे बडे स्‍तर पर आयोजित किया था, जो कि धीरे-धीरे पूरे राष्ट्र में मनाया जाने लगा है और आज गणपति उत्‍सव महाराष्‍ट्र में एक प्रकार के राष्‍ट्रीय उत्‍सव की तरह मनाया जाता है, जिसकी शुरूआत 1893 में महाराष्ट्र से लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने की।

जिस समय तिलक ने इस उत्‍सव को बडे स्‍तर पर मनाना शुरू किया था, उस समय वे एक युवा क्रांतिकारी और गर्म दल के नेता के रूप में जाने जाते थे। वे एक बहुत ही स्पष्ट वक्ता थे और प्रभावी ढंग से भाषण देने में माहिर थे। तिलक ‘स्वराज’ के लिए संघर्ष कर रहे थे और वे अपनी बात को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाना चाहते थे। इसके लिए उन्हें ऐसा सार्वजानिक मंच चाहिए था, जहां से उनके विचार अधिकांश लोगों तक पहुंच सके और इस काम को करने के लिए उन्होंने गणपति उत्सव को चुना तथा इसे वह सुंदर व भव्य रूप दिया जिसे आज हम देखते हैं।

बाल गंगाधर तिलक के इस कार्य से ये हुआ कि वे अपने विचारों को ज्‍यादा से ज्‍यादा लोगों तक पहुंचा पाए जिससे स्‍वराज आन्‍दोलन को बल मिला और भारत आजाद होने में एक कदम और आगे बढा क्‍योंकि इस उत्सव ने आम जनता को भी स्वराज के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा दी और उन्हें जोश से भर दिया। इस तरह से गणपति उत्सव ने भी आजादी की लड़ाई में अव्‍यक्‍त रूप से एक अहम् भूमिका निभाई और  तिलक जी द्वारा शुरू किए गए इस उत्सव को आज भी हम सभी भारतीय लगभग पूरे देश में पूरे धूमधाम से मनाते हैं।

क्‍यों कहते हैं “गणपति बप्‍पा मोरया”

गणपति बप्‍पा से जुड़े मोरया नाम के पीछे गण‍पति जी का मयूरेश्‍वर स्‍वरूप माना जाता है। गणेश-पुराण के अनुसार सिंधु नामक दानव के अत्‍याचार से बचने हेतु देवगणों ने गणपति जी का आह्वान किया। सिंधु का संहार करने के लिए गणेश जी ने मयूर (मोर) को अपना वाहन चुना और छह भुजाओं वाला अवतार धारण किया। इस अवतार की पूजा भक्‍त लोग “गणपति बप्‍पा मोरया” के जयकारे के साथ करते हैं, और यही कारण है की जब गणेश जी को विसर्जित किया जाता है तो गणपति बप्‍पा मोरया, अगले बरस तू जल्‍दी आ का नारा लागया जाता है।

भगवान गणेश की स्‍थापना का शुभ महुर्त

भगवान गणेश के पूजन के बगैर कोई भी कार्य प्रारंभ नहीं होता। विघ्नहरण करने वाले देवता के रूप में पूज्य गणेश जी सभी बाधाओं को दूर करने तथा मनोकामना को पूरा करने वाले देवता हैं। इस बार गणेश स्थापना 1 सितंबर को की जाएगी। इसके मुहूर्त निम्नानुसार है।

ज्योतिषाचार्य के अनुसार एक सितंबर को भादौ माह शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को गणेश भगवान का जन्म हुआ था। शास्त्रों में भी उल्लेख मिलता है कि उनका जन्म मध्याह्न काल में हुआ था। इस बार स्थापना पर भद्रा का प्रभाव होने के कारण लोग सुबह 8.39 से शाम 7.02 मिनट तक स्थापना नहीं कर सकेंगे।

गणेश स्थापना के लिए शुभ मुहूर्त सुबह 7.44 मिनट तक ही बन रहा है। शाम को 7.03 मिनट से 9.30 मिनट तक पड़ने वाले चौघड़‍िया मुहूर्त में गणेश स्थापना हो सकती है। उसके बाद रात 11.16 से 12.16 मिनट तक वृषभ लग्न में भी मूर्ति स्थापना के लिए शुभ है।

ज्योतिषाचार्य के मतानुसार सुबह सूर्योदय से 7.44 तक है। दिन में 11.42 से 2 बजे तक और शाम को 5.07 से 7.27 बजे तक गणेश स्थापना की जा सकती है।

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