रोशन नेमा, संपादक
जिसे कल तक जनता ‘किंग’ कहकर सिर पर बैठाती थी, आज उसी से पूछ रही है—किरदार कहां है?
‘हनुमान अंश’ का एक विचार याद आता है—आपकी दृष्टि ही तय करती है कि आपको दुनिया कैसी दिखाई देगी। शायद दर्शक की दृष्टि बदल चुकी है। अब उसे पर्दे पर स्टार का रुतबा नहीं, अभिनेता का अभिनय दिखाई देना चाहिए।
कभी सिर्फ किसी बड़े स्टार का नाम फिल्म को भीड़ खींचने के लिए काफी होता था। ‘किंग’, ‘बादशाह’ और ‘सुपरस्टार’ जैसे तमगे लोकप्रियता के प्रतीक थे। लेकिन अब वही तमगे कई बार दर्शक को आकर्षित करने के बजाय सवाल खड़ा करते हैं—इतना बड़ा नाम है, लेकिन फिल्म में कितना दम है?
यही बदलाव बॉलीवुड के पुराने स्टार सिस्टम के लिए सबसे बड़ा खतरा है।
दर्शक अब केवल चमक-दमक और बड़े नाम से प्रभावित नहीं होता। उसे ऐसी कहानी चाहिए जिसमें वह खुद को देख सके और ऐसा अभिनेता चाहिए जो अपने नाम को पीछे छोड़कर किरदार बन जाए।
यही वह जगह है जहां नए और कम चर्चित कलाकार बड़े सितारों को चुनौती देते दिखाई देते हैं। उनके पास भारी उपाधियां नहीं होतीं, लेकिन उनके पास अभिनय के लिए पूरी जगह होती है।
अभिनेता और राजा में एक बुनियादी फर्क है—राजा के पास राज्य होता है, अभिनेता के पास दर्शक। और दर्शक किसी का स्थायी प्रजा नहीं होता।
आज ओटीटी और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने विकल्प बढ़ा दिए हैं। दर्शक के पास किसी एक स्टार को स्वीकार करने की मजबूरी नहीं है। वह टिकट न खरीदकर, स्क्रीन बदलकर या फिल्म छोड़कर भी अपना फैसला सुना सकता है।
स्टार का नाम फिल्म को शुरुआत दे सकता है, लेकिन किरदार ही उसे यादगार बनाता है।
शायद इसलिए स्टारडम का सिंहासन हिल रहा है। जनता सितारों को गिरा नहीं रही—वह बस ताज देखने के बजाय कहानी देखने लगी है।























