मेरा बूथ सबसे मजबूत… लेकिन जिम्मेदारी किसकी?

रोशन नेमा,
व्यवस्था का आईना

कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी का अहसास कराने के लिए दिया जाने वाला नारा “मेरा बूथ सबसे मजबूत” शायद अब अपनी मूल अवधारणा से भटक गया है।

पिछले 20 वर्षों में यही वह मंत्र रहा, जिसका जाप करते हुए अंतिम पंक्ति का कार्यकर्ता पूरे उत्साह के साथ घर-घर पहुंचा और वोट के रूप में ईंधन जुटाकर सत्ता के इस डबल इंजन को ताकत देता रहा।

“पपीहा पन को ना तजै, तजै तो तन बेकाज…”
लेकिन तन-मन से समर्पित कार्यकर्ताओं वाली चल रही नगर सरकार की अव्यवस्था के बीच अब कार्यकर्ता भी शायद यही कहने लगा है—स्वाति नक्षत्र अभी दूर है।

एक सुबह फोन आया—

“भैया, मेरा बच्चा और मैं स्कूल जाते समय सड़क के गड्ढे में फिसल गए। आप लोग सड़क ठीक कराने के लिए कुछ क्यों नहीं करते?”

सवाल सुनकर मेरे मन में भी सवाल उठा—मेरी जिम्मेदारी क्या है? और जिस व्यक्ति को मैं जानता तक नहीं, उसने मुझे ही फोन क्यों किया?

बिना समय गंवाए बताए गए स्थान पर पहुंचा, लेकिन फोन करने वाला तब तक वहां से जा चुका था।

नजदीक ही दो दृश्य सामने थे।
एक तरफ सड़क किनारे बिकते बेलपत्र और धतूरे।
दूसरी तरफ कीचड़ में फंसी स्कूल वैन।

पहली नजर में खबर इतनी ही थी कि सड़क खराब है और आने वाले समय में शायद इसे ठीक कर दिया जाएगा।

लेकिन असली विषय सड़क नहीं था।

तीसरा दृश्य सामने था—चुनावी मतदान केंद्र।

जिस मोड़ पर स्कूल वैन कीचड़ में फंसी थी, वहीं से मतदान केंद्र लगा हुआ था। एक तरफ बेलपत्र की दुकान थी और दूसरी तरफ लोकतंत्र का वह दरवाजा, जहां चुनाव के समय मतदाता पहुंचता है।

संकेत शायद साफ था।

नारा सिर्फ चुनाव के मौसम में नहीं, व्यवस्था के बीच भी दिखाई देना चाहिए।

“मेरा बूथ सबसे मजबूत” कहने वाले संगठन के सिपाहियों के सामने सवाल यह है कि जिस बूथ पर चुनाव के समय मतदाता रूपी भगवान को सिर झुकाकर वोट देने बुलाया जाता है, क्या वहां तक पहुंचने वाली सड़क भी मजबूत है?

आज वह मतदाता भगवान चुनावी मौसम का इंतजार नहीं कर रहा।
वह तो रोज उसी सड़क से गुजर रहा है—
कभी कीचड़ में फंसकर, कभी गड्ढे में गिरकर और कभी व्यवस्था को देखकर सूखे आंसू बहाकर।

शायद बूथ की असली मजबूती चुनावी नारे से नहीं,
मतदाता के भरोसे से तय होती है।

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