मध्य प्रदेश की विरासत आधारित विकास नीति का दीर्घकालिक उद्देश्य क्या है?

मध्य प्रदेश की असली पूंजी केवल उसके संसाधनों में नहीं, उसकी विरासत में है। खजुराहो और सांची के स्मारकों से लेकर मांडू की स्थापत्य परंपरा, ग्वालियर के किलों, उज्जैन की सांस्कृतिक चेतना, जनजातीय कला, लोकभाषाओं, लोकगीतों, हस्तशिल्प और सदियों पुरानी परंपराओं तक—यह प्रदेश अपने अतीत को आज भी जीवित रखता है।

ऐसे में विरासत आधारित विकास नीति का उद्देश्य केवल पर्यटकों की संख्या बढ़ाना नहीं हो सकता। इसका बड़ा सवाल है—क्या विकास की रफ्तार के साथ मध्य प्रदेश अपनी पहचान को भी सुरक्षित रख पाएगा?

पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने Destination आधारित आयोजनों, क्षेत्रीय पर्यटन कार्यक्रमों और अन्य पहलों के माध्यम से प्रदेश की विरासत को व्यापक मंच देने की कोशिश की है। पर्यटन नीति-2025 को कैबिनेट की मंजूरी और सांस्कृतिक एवं धार्मिक स्थलों के विकास पर जोर इसी व्यापक दृष्टि का हिस्सा है। लेकिन इन पहलों की सफलता का वास्तविक पैमाना केवल निवेश या पर्यटकों के आंकड़े नहीं, बल्कि विरासत के संरक्षण की गुणवत्ता होना चाहिए।

किसी पुराने किले का जीर्णोद्धार कर देना ही विरासत संरक्षण नहीं है। उसके स्थापत्य की मौलिकता, उसके इतिहास की प्रमाणिकता और उससे जुड़ी लोकस्मृति को बचाए रखना भी उतना ही जरूरी है। यही बात लोककला, जनजातीय परंपराओं, शिल्प और स्थानीय संस्कृति पर लागू होती है।

विरासत को संग्रहालय में बंद करने के बजाय उसे समाज की जीवित पहचान बनाए रखना होगा। स्थानीय समुदाय, कलाकार, कारीगर और नई पीढ़ी इस प्रक्रिया के केंद्र में हों तभी संरक्षण स्थायी बनेगा।

मध्य प्रदेश की विरासत आधारित विकास नीति का दीर्घकालिक उद्देश्य इसलिए स्पष्ट होना चाहिए—विकास ऐसा हो जो भविष्य बनाए, लेकिन अतीत को मिटाकर नहीं।

क्योंकि सड़कें और इमारतें विकास की तस्वीर बना सकती हैं, लेकिन विरासत ही उस तस्वीर को पहचान देती है।

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