
नई दिल्ली। भारत में सरकारी सामाजिक कल्याण योजनाओं के माध्यम से गरीब और जरूरतमंद परिवारों को मिलने वाली मुफ्त या रियायती वस्तुओं से उनके जीवन स्तर में सुधार दर्ज किया गया है। सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) के सांख्यिकीविदों के अध्ययन के अनुसार, देश में लगभग 22 करोड़ लोगों के जीवन स्तर में सुधार का अनुमान सामने आया है। यह आंकड़ा 2022-23 के घरेलू उपभोग व्यय सर्वेक्षण के आंकड़ों पर आधारित अध्ययन में सामने आया, जिसकी रिपोर्ट 17 अक्टूबर 2026 को द इंडियन एक्सप्रेस ने प्रकाशित की।
किन सरकारी योजनाओं और सुविधाओं का हुआ अध्ययन?
राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) की पत्रिका सर्वेक्षण (Sarvekshna) में प्रकाशित शोधपत्र में सरकारी कल्याण कार्यक्रमों के अंतर्गत मुफ्त या रियायती दर पर मिलने वाली वस्तुओं के अनुमानित आर्थिक मूल्य को शामिल करके परिवारों के उपभोग स्तर का विश्लेषण किया गया।
अध्ययन में खाद्यान्न, लैपटॉप, साइकिल और स्कूल यूनिफॉर्म जैसी वस्तुओं को शामिल किया गया। शोधकर्ताओं ने यह तुलना की कि इन सुविधाओं के मूल्य को परिवारों के मासिक प्रति व्यक्ति उपभोग व्यय में जोड़ने पर उनकी उपभोग श्रेणी में कितना बदलाव आता है।
यह स्पष्ट करना जरूरी है कि 22 करोड़ का आंकड़ा सीधे नकद आय बढ़ने या इतने लोगों के गरीबी रेखा से बाहर निकलने का प्रमाण नहीं है। यह सरकारी सहायता के रूप में मिलने वाली चुनिंदा वस्तुओं के अनुमानित मूल्य को शामिल करने के बाद उपभोग श्रेणी में सुधार का आकलन है।
ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक प्रभाव
अध्ययन के अनुसार, सरकारी वस्तुगत सहायता का प्रभाव ग्रामीण क्षेत्रों में अपेक्षाकृत अधिक पाया गया।
| क्षेत्र | जीवन स्तर में सुधार का अनुमान |
|---|---|
| भारत | 15.8% आबादी |
| ग्रामीण क्षेत्र | 18.8% आबादी |
| शहरी क्षेत्र | 8.4% आबादी |
ग्रामीण क्षेत्रों में सहायता का अनुमानित मूल्य शामिल करने के बाद 4 से 33 प्रतिशत आबादी विभिन्न उपभोग श्रेणियों में ऊपर गई। शहरी क्षेत्रों में यह दायरा 1 से 22 प्रतिशत रहा।
किन राज्यों में सबसे अधिक सुधार दर्ज किया गया?
अध्ययन में प्रमुख राज्यों के बीच भी अंतर सामने आया। पश्चिम बंगाल में 40.5 प्रतिशत आबादी के उपभोग स्तर में सुधार का अनुमान दर्ज किया गया। इसके बाद छत्तीसगढ़ में 29.2 प्रतिशत, असम में 29 प्रतिशत और कर्नाटक में 28.4 प्रतिशत का आंकड़ा सामने आया।
| राज्य | अनुमानित आबादी में सुधार |
|---|---|
| पश्चिम बंगाल | 40.5% |
| छत्तीसगढ़ | 29.2% |
| असम | 29.0% |
| कर्नाटक | 28.4% |
ये आंकड़े अध्ययन में इस्तेमाल की गई पद्धति के आधार पर हैं। इन्हें राज्यों की समग्र गरीबी दर में कमी के बराबर नहीं माना जाना चाहिए।
मुफ्त खाद्यान्न और अन्य सहायता का आर्थिक महत्व
सरकारी कल्याण योजनाओं के अंतर्गत मिलने वाली वस्तुओं का आर्थिक मूल्य परिवारों के वास्तविक उपभोग संसाधनों को समझने में मदद करता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी परिवार को मुफ्त खाद्यान्न मिलता है, तो उसे बाजार से उतनी मात्रा में खाद्यान्न खरीदने पर खर्च नहीं करना पड़ता। इससे परिवार की अन्य जरूरी जरूरतों के लिए उपलब्ध संसाधनों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
अध्ययन में ग्रामीण भारत का औसत मासिक प्रति व्यक्ति उपभोग व्यय वस्तुगत सहायता का अनुमानित मूल्य शामिल करने पर ₹3,773 से बढ़कर ₹3,860 हुआ। शहरी भारत में यह ₹6,459 से बढ़कर ₹6,521 हुआ। ये आंकड़े 2022-23 के सर्वेक्षण से संबंधित हैं, वर्तमान मासिक खर्च के आंकड़े नहीं।
स्वास्थ्य और शिक्षा सेवाओं का मूल्य शामिल नहीं
अध्ययन की एक महत्वपूर्ण सीमा यह है कि इसमें आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के अंतर्गत उपलब्ध मुफ्त चिकित्सा सेवाओं और मुफ्त शिक्षा सेवाओं का अनुमानित मूल्य शामिल नहीं किया गया। शोधपत्र के अनुसार, इन सुविधाओं को शामिल करने पर विशेष रूप से निम्न उपभोग श्रेणियों वाले परिवारों के जीवन स्तर का आकलन और बेहतर हो सकता था।
सामाजिक कल्याण योजनाओं के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह अध्ययन?
यह अध्ययन बताता है कि गरीबी और जीवन स्तर का आकलन करते समय केवल नकद आय या परिवार के सीधे खर्च को देखना पर्याप्त नहीं हो सकता। मुफ्त खाद्यान्न और अन्य सरकारी सहायता का आर्थिक मूल्य भी परिवार की वास्तविक उपभोग क्षमता को प्रभावित करता है।
हालांकि, योजनाओं का वास्तविक प्रभाव समझने के लिए लाभार्थियों तक सहायता पहुंचने, पात्रता, वितरण की नियमितता और परिवारों की जरूरतों के अनुरूप लाभ मिलने का आकलन भी जरूरी है।
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स्रोत: द इंडियन एक्सप्रेस, 17 अक्टूबर 2026; MoSPI/NSO के 2022-23 घरेलू उपभोग व्यय सर्वेक्षण पर आधारित अध्ययन, Sarvekshna पत्रिका।




